राष्ट्रीय

वैश्विक कूटनीतिक लड़ाई में गेहूं बना हथियार

दूसरे देशों की नजर भारत के पीडीएस वाले गेहूं के स्टाक पर
नई दिल्ली। वैश्विक कूटनीतिक लड़ाई में फिलहाल गेहूं एक हथियार बन गया है, जिसका उपयोग हर देश अपने तरीके से कर रहा है। गेहूं के वैश्विक बाजार में भारतीय गेहूं की मामूली हिस्सेदारी के बावजूद उस पर निर्यात बढ़ाने के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा है। आगामी जून में डब्लूटीओ की होने वाली बैठक में यह मुद्दा जोर- शोर से उठाया सकता है। हालांकि भारत भी इस मौके का उपयोग कर सकता है, जिसमें वह अपने खिलाफ लगाए गए कई तरह के प्रतिबंधों में रियायत लेने की कोशिश करेगा। गेहूं निर्यात पर लगी रोक के लिए भारत को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। जबकि भारत की पहली प्राथमिकता देश की खाद्य सुरक्षा को महफूज रखने की है। दूसरी ओर दुनिया के सबसे बड़े गेहूं निर्यातक प्रमुख देशों में शुमार रूस, यूरोप, अमेरिका, कनाडा और अर्जेंटीना अपने निर्यात को सीमित करने की कोशिश में जुटे हुए हैं।
गेहूं निर्यात में इन देशों की हिस्सेदारी 60 फीसद से भी अधिक है, जबकि गेहूं के विश्व बाजार में भारत की हिस्सेदारी चार फीसद के आसपास है। भारत ने गेहूं निर्यात पर रोक लगाने के साथ ही स्पष्ट कर दिया है कि भारत उन देशों को गेहूं का निर्यात पूर्ववत करता रहेगा, जिनकी खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा होगा। लेकिन ऐसे देशों को लिए गेहूं निर्यात करना संभव नहीं होगा, जो गेहूं की खरीद स्टाक करने के लिए कर रहे थे। मिस्र ने अपना बाजार भारतीय गेहूं के लिए खोला है। मिस्र दुनिया का बहुत बड़ा गेहूं आयातक देश है, जो यूक्रेन और रूस से गेहूं आयात करता था। वहां की सरकार के आग्रह पर मिस्र को गेहूं का निर्यात जारी है। लेकिन इसके विपरीत तुर्की जैसा देश गेहूं का आयात खाने के लिए नहीं, बल्कि कच्चे औद्योगिक माल के रूप में करता है। आयातित गेहूं की प्रोसेसिंग कर यूक्रेन यूरोपीय संघ के देशों में निर्यात करता है।
कुछ ऐसे देशों से भी गेहूं आयात का आग्रह किया जा रहा था, जहां गेहूं की खपत नहीं के बराबर है। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि वैश्विक स्तर पर गेहूं का उत्पादन प्रभावित हुआ है, जिसके चलते बाजार में तेजी का रुख है। इसी के चलते गेहूं के बड़े उत्पादक देश कम उत्पादन के अनुमान की आड़ में निर्यात से बच रहे हैं। इसके विपरीत भारत जैसे देश पर निर्यात बढ़ाने के लिए दबाव बना रहे हैं। सबकी नजर भारत के एमएसपी पर खरीदे गए गेहूं के स्टाक पर है। जबकि भारत अपनी 67 फीसद आबादी यानी करीब 81 करोड़ लोगों को अति रियायती दरों में अनाज वितरित करने के लिए (एनएफएसए) कानूनी रूप से बाध्य है।

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