उत्तराखण्डनैनीताल

उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव पर लगी रोक हटी, हाईकोर्ट ने दिए नए कार्यक्रम जारी करने के निर्देश

निर्वाचन आयोग को 3 दिन बढ़ाते हुए तिथियां जारी करने के निर्देश,
दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए
23 जून को हाईकोर्ट ने लगाई थी रोक,
25 से 28 जून तक होने थे नामांकन
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने शुक्रवार को राज्य में पंचायत चुनावों पर लगी रोक को हटा लिया है। लेकिन राज्य सरकार से चुनावों के लिए राज्य के आरक्षण रोस्टर में अनियमितताओं का आरोप लगाने वाली जनहित याचिकाओं पर जवाब देने को कहा।राज्य में पंचायत चुनावों के लिए आरक्षण रोस्टर को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक महारा की खंडपीठ ने राज्य में पंचायत चुनावों पर लगी रोक हटा दी। पीठ ने राज्य चुनाव आयोग को पहले के चुनाव कार्यक्रम को तीन दिन आगे बढ़ाते हुए नया कार्यक्रम जारी करने का निर्देश दिया। अदालत ने सरकार से याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों पर तीन सप्ताह के भीतर जवाब देने को भी कहा।
राज्य चुनाव आयोग से पूर्व में जारी चुनाव कार्यक्रम को तीन दिन आगे बढ़ाते हुए चुनाव कार्यक्रम जारी करने को कहा है। साथ ही सरकार को याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाये गए मुद्दों पर तीन हप्ते के भीतर जबाव देने के भी निर्देश दिए। हाईकोर्ट के पंचायत चुनावों से रोक हटाने और राज्य निर्वाचन आयोग को तीन दिन आगे बढ़ाते हुए नया कार्यक्रम जारी किए जाने के निर्देश से करीब हफ्तेभर चुनाव आगे खिसक गए हैं। क्योंकि 21 जून को जारी चुनाव कार्यक्रम के अनुसार 25 से 28 जून तक नामांकन होने थे, शुक्रवार 27 जून को हाईकोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया से रोक हटाते हुए तीन दिन बढ़ाकर नया कार्यक्रम जारी करने के आदेश दिए हैं।
शुक्रवार को सुनवाई में ब्लाक प्रमुख सीटों का आरक्षण निर्धारित करने व जिला पंचायत अध्यक्ष सीटों का आरक्षण निर्धारित न करने पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। कोर्ट को बताया गया कि ब्लॉक प्रमुख व जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव एक ही तरह से होता है। एक याची ने कोर्ट को बताया कि देहरादून के डोईवाला ब्लॉक में ग्राम प्रधानों के 63 फीसदी सीटें आरक्षित की गई हैं। मुख्य न्यायधीश जी नरेंद्र व न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खण्डपीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से आरक्षण रोस्टर में कई सीटों के लंबे समय से एक ही वर्ग को प्रतिनिधित्व मिलने का उल्लेख करते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 243 व सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय समय पर दिए आदेशों के खिलाफ  बताया । महाधिवक्ता व मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने सरकार का पक्ष रखते हुए बताया कि पिछड़ा वर्ग समर्पित आयोग की रिपोर्ट के बाद आरक्षण रोस्टर को शून्य घोषित करना व वर्तमान पंचायत चुनाव को प्रथम चरण माना जाना आवश्यक था।

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