उत्तरकाशीउत्तराखण्ड
साहस और जज्बे की मिसाल- जान जोखिम में डाल चालीस किलोमीटर पैदल सफर कर धराली पहुंचे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माहरा,लोगों का दुख दर्द बांटा, मदद का दिलाया भरोसा

आपदा प्रभावित धराली गांव तक पहुंचने के लिए कठिन और जोखिम भरा रास्ता तय किया
उत्तरकाशी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करन माहरा ने साहस और जज्बे की मिसाल पेश करते हुए आपदा प्रभावित धराली गांव तक पहुंचने के लिए कठिन और जोखिम भरा रास्ता तय किया। वे लोगों के बीच केवल संवेदना जताने नहीं, बल्कि उनके दुःख-दर्द को करीब से समझने और मदद का भरोसा देने पहुंचे।
धराली तक पहुंचने का रास्ता इस समय किसी युद्धक्षेत्र जैसा है—भूस्खलन से टूटी सड़कें, चट्टानों से घिरा संकरा मार्ग और तेज बहाव से उफनती नदियां। माहरा ने करीब चालीस किलोमीटर पैदल सफर किया। कई जगह उन्हें चट्टान पर बंधी रस्सियों का सहारा लेकर उतरना पड़ा, तो कहीं तेज बहाव वाली नदी को पार करना पड़ा। हर कदम पर खतरा था, लेकिन आपदा पीड़ितों तक पहुंचने का संकल्प उन्हें आगे बढ़ाता रहा।
गांव पहुंचकर माहरा ने तबाही का मंजर अपनी आंखों से देखा—टूटी-फूटी घरों की दीवारें, बिखरे सामान, और आंखों में डर व दर्द लिए ग्रामीण। उन्होंने प्रभावित परिवारों को ढांढस बंधाया और हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा कि यह समय राजनीति का नहीं, बल्कि इंसानियत और एकजुटता का है।
माहरा ने सरकार से तत्काल राहत और पुनर्वास की व्यवस्था तेज करने की मांग की। उन्होंने कहा कि ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में फंसे लोगों तक राहत पहुंचाना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि कोई भी मदद से वंचित न रह जाए।
धराली की इस यात्रा ने यह साफ कर दिया कि जब इरादा मजबूत हो, तो पहाड़ जैसी मुश्किलें भी रास्ता नहीं रोक पातीं। करण माहरा का यह कदम आपदा पीड़ितों के लिए उम्मीद की किरण साबित हुआ है। माहरा का कठिन और जोखिम भरा सफर आपदा प्रभावित लोगों को नहीं हिम्मत देगा।
उत्तरकाशी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करन माहरा ने साहस और जज्बे की मिसाल पेश करते हुए आपदा प्रभावित धराली गांव तक पहुंचने के लिए कठिन और जोखिम भरा रास्ता तय किया। वे लोगों के बीच केवल संवेदना जताने नहीं, बल्कि उनके दुःख-दर्द को करीब से समझने और मदद का भरोसा देने पहुंचे।
धराली तक पहुंचने का रास्ता इस समय किसी युद्धक्षेत्र जैसा है—भूस्खलन से टूटी सड़कें, चट्टानों से घिरा संकरा मार्ग और तेज बहाव से उफनती नदियां। माहरा ने करीब चालीस किलोमीटर पैदल सफर किया। कई जगह उन्हें चट्टान पर बंधी रस्सियों का सहारा लेकर उतरना पड़ा, तो कहीं तेज बहाव वाली नदी को पार करना पड़ा। हर कदम पर खतरा था, लेकिन आपदा पीड़ितों तक पहुंचने का संकल्प उन्हें आगे बढ़ाता रहा।
गांव पहुंचकर माहरा ने तबाही का मंजर अपनी आंखों से देखा—टूटी-फूटी घरों की दीवारें, बिखरे सामान, और आंखों में डर व दर्द लिए ग्रामीण। उन्होंने प्रभावित परिवारों को ढांढस बंधाया और हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा कि यह समय राजनीति का नहीं, बल्कि इंसानियत और एकजुटता का है।
माहरा ने सरकार से तत्काल राहत और पुनर्वास की व्यवस्था तेज करने की मांग की। उन्होंने कहा कि ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में फंसे लोगों तक राहत पहुंचाना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि कोई भी मदद से वंचित न रह जाए।
धराली की इस यात्रा ने यह साफ कर दिया कि जब इरादा मजबूत हो, तो पहाड़ जैसी मुश्किलें भी रास्ता नहीं रोक पातीं। करण माहरा का यह कदम आपदा पीड़ितों के लिए उम्मीद की किरण साबित हुआ है। माहरा का कठिन और जोखिम भरा सफर आपदा प्रभावित लोगों को नहीं हिम्मत देगा।





