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लोककला ऐपण को ज्योति जोशी ने बनाया  आत्मनिर्भरता, स्वरोजगार और महिला सशक्तिकरण का सशक्त माध्यम, राष्ट्रीय स्तर पर दिलाई पहचान

लोककला ऐपण से  ज्योति जोशी  महिलाओं को बना रहीं आत्मनिर्भर
देहरादून। उत्तराखंड की पहचान उसकी समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं से है। इन्हीं परंपराओं में से एक है कुमाऊँ अंचल की विशिष्ट लोककला ऐपण, जो कभी केवल घरों की देहरी और पूजा स्थलों तक सीमित थी। आज यह कला आत्मनिर्भरता, स्वरोजगार और महिला सशक्तिकरण का सशक्त माध्यम बन रही है।
अल्मोड़ा जनपद की निवासी और वर्तमान में देहरादून में रह रहीं ज्योति जोशी इस परिवर्तन की जीवंत मिसाल हैं ।
देहरादून के परेड ग्राउंड में चल रहे दून पुस्तक महोत्सव में बाल मंडप में बच्चों के लिए ऐपण की वर्कशॉप आयोजित करने के दौरान शाह टाइम्स से बातचीत करते हुए ज्योति जोशी ने बताया कि उन्होंने अपनी
प्रारंभिक शिक्षा पिथौरागढ़ से पूर्ण की तथा समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर की शिक्षा कुमाऊं विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इसके साथ ही उन्होंने बी.एस. नेगी महिला पॉलिटेक्निक, कौलागढ़, देहरादून से फैशन डिजाइनिंग में तीन वर्षीय डिप्लोमा किया। बचपन से ही दादी और माँ को घरों में ऐपण बनाते देखने से इस लोककला के प्रति उनका विशेष लगाव विकसित हुआ।
कोविड के बाद बीते छह–सात वर्षों से ज्योति जोशी ने लोककला ऐपण को संरक्षित करने और उसे स्वरोजगार से जोड़ने का संकल्प लिया। छोटे स्तर पर घर से शुरू किया गया यह प्रयास आज एक सशक्त पहचान बन चुका है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं, स्कूलों, महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं को ऐपण कला का प्रशिक्षण देकर न केवल इस परंपरा को आगे बढ़ाया, बल्कि अनेक परिवारों के लिए आय का नया स्रोत भी तैयार किया।
ज्योति जोशी द्वारा तैयार किए गए ऐपण आधारित उत्पाद—रक्षाबंधन की राखियां, करवाचौथ पूजा सेट, ऐपण पेंटिंग्स, साड़ियां, स्टॉल, की-चेन, कार हैंगिंग, केतली, बैग, टोपी, तोरण, डायरी और ज्वेलरी—प्रदर्शनियों में देश-विदेश से आए लोगों द्वारा खूब सराहे गए। राजभवन देहरादून के पुष्प महोत्सव, विरासत महोत्सव सहित विभिन्न आयोजनों में उनके कार्यों ने विशेष पहचान बनाई।
सरकारी स्तर पर भी उनके प्रयासों को सराहा गया।  विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी से मुलाकात के बाद उन्होंने विधानसभा भवन रिस्पना में ऐपण से गोल गुंबद तैयार किया तथा भराड़ीसैंण विधानसभा भवन में ऐपण से बनी पेंटिंग्स और रम्माण मुखौटा चित्रण स्थापित किए गए। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति निकेतन, देहरादून में ऐपण पेंटिंग्स का उद्घाटन  राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा किया जाना उनके कार्य की राष्ट्रीय स्वीकृति का प्रमाण है।
ज्योति जोशी ने डायट देहरादून एवं बड़कोट में विभिन्न जनपदों से आए शिक्षकों के लिए ऐपण कार्यशालाएँ आयोजित कीं, जिसके बाद शिक्षकों ने अपने-अपने विद्यालयों में विद्यार्थियों को यह लोककला सिखाकर विद्यालय परिसरों को ऐपण से सजाया।
महिला सशक्तिकरण की दिशा में उनका कार्य अत्यंत प्रेरणादायक है। वे सुद्धोवाला जेल में बंद महिला कैदियों को निःशुल्क ऐपण प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बना रही हैं। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाएं थाली, टोपी, ज्वेलरी, साड़ी, बास्केट, राखी आदि बनाना सीख रही हैं, ताकि जेल से बाहर आने के बाद सम्मानजनक जीवन जी सकें और लोककला को आगे बढ़ा सकें।
ज्योति जोशी अपने उत्पादों को ‘गुड़िया आर्ट प्रोडक्ट’नाम से पहचान देती हैं, जिसे वे वेबसाइट और इंस्टाग्राम के माध्यम से लोगों तक पहुँचाती हैं। वे टेलर के पास बचे कटे कपड़ों का उपयोग कर पर्यावरण-संवेदनशील उत्पाद तैयार करती हैं, जिससे रीसायक्लिंग और सतत विकास को भी बढ़ावा मिलता है।
घर से शुरू हुए इस सफ़र में ज्योति जोशी के साथ एक मजबूत संबल भी हमेशा खड़ा रहा। ज्योति बताती हैं कि उनकी इस पूरी यात्रा में उनके पति सुधीर जोशी का सहयोग हर कदम पर मिला। वे न केवल उनके कार्यों में सहभागी बने, बल्कि हर निर्णय में मार्गदर्शन भी करते रहे। ज्योति के अनुसार, जब भी चुनौतियाँ सामने आईं—चाहे आर्थिक हों, सामाजिक हों या मानसिक—उनके पति ने उन्हें आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया।
वे मानती हैं कि “यदि परिवार का साथ न हो, तो किसी भी महिला का आगे बढ़ना कठिन हो जाता है। मेरे लिए मेरे पति का सहयोग मेरी सबसे बड़ी ताकत रहा है।”
ज्योति का मानना है कि हमारी संस्कृति ही हमारी असली पहचान है। वे युवा पीढ़ी से आह्वान करती हैं कि वे अपनी विरासत से जुड़ें, उसका सम्मान करें और आने वाली पीढ़ियों तक उसे पहुँचाएं। कला के माध्यम से संस्कृति को आगे बढ़ाने के साथ-साथ वे  भाषा के संरक्षण हेतु आकाशवाणी देहरादून से जुड़कर भी कार्य कर रही हैं।
निस्संदेह, ज्योति जोशी की यह यात्रा सिद्ध करती है कि लोककला केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की आत्मनिर्भरता का सशक्त आधार भी बन सकती है।
ऐपण का है धार्मिक महत्व
ऐपण पुराने समय से ही घरों, मंदिरों में बनाया जाता है,यह कला पूर्ण रूप से देवी -देवताओं को समर्पित है ‌। घरों में हो रहे शुभ कार्य शान्ति एवं मंगलमय तरीके से सम्पन्न हो इसके लिए हर शुभ कार्य की शुरुआत ऐपण डालकर की जाती है। पुराने समय से कहा जाता है कि ऐपण डालकर देवी -देवताओं का आह्वान किया जाता है ।
गांव घरों में गेरू (लाल मिट्टी) और चावल के बिस्वार से ऐपण डाले जाते थे, लेकिन समय के साथ इसकी जगह अब इनेमल पेन्टस ने ले ली है। आज ऐपण स्वरोजगार का बहुत बड़ा माध्यम बन गया है। अब यह केवल घर की देहली दरवाजों तक सीमित नहीं है ,बल्कि देश विदेश तक पहुंच गई है ।अब इससे विभिन्न प्रकार की वस्तुएं बनाई जा रही है। जिनमें थाली,कलश, पूजा चौकी, पेंटिंग्स, साड़ियां,बैग, डायरी, ज्वैलरी,नेम प्लेट,की चेन,कार हैंगिंग, केतली आदि शामिल हैं, जिन्हें लोगों के द्वारा खूब खरीदा और पसंद किया जाता है।

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