कांग्रेस ने 1200 करोड़ की आपदा राहत राशि को बताया निराशाजनक, आपदा से हुई हानि की प्रतिपूर्ति के लिए उत्तराखंड सरकार करे मजबूत पैरवी : प्रीतम सिंह

पूर्व सीएम हरीश रावत बोले – राज्य के किए गए आंकलन के सापेक्ष देना चाहिए था पर्याप्त धन ,
पूर्व सीएम व पूर्व नेता प्रतिपक्ष ने की संयुक्त प्रेसवार्ता,
देहरादून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड को आपदा राहत एवं पुनर्निमाण कार्यों के लिए अग्रिम तौर पर की गई 1200 करोड़ रुपये की मदद की घोषणा को कांग्रेस ने निराशाजनक बताया है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत एवं पूर्व नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह ने कांग्रेस भवन में शुक्रवार को एक संयुक्त प्रेसवार्ता की। उन्होंने कहा कि बीते रोज देश के प्रधानमंत्री उत्तराखंड राज्य आए तो हमें यह अपेक्षा थी कि राज्य सरकार ने जो 5702 करोड़ का प्रस्ताव आपदा में हुए नुकसान को लेकर उनके सामने रखा है वह उसका मान रखते हुए उसे स्वीकार करेंगे लेकिन बड़े खेद का विषय है कि उन्होंने राज्य में आई इतनी भीषण आपदा के लिए राहत राशि के तौर पर मात्र 1200 करोड़ की घोषणा की जो कि बहुत ही निराशाजनक है। प्रीतम सिंह ने कहा कि राज्य में 2013 की दैवीय आपदा जब आई थी तो कांग्रेस की गठबंधन सरकार केंद्र और राज्य में भी कांग्रेस की सरकार थी, उस वक्त हमने दैवीय आपदा के मानकों में व्यापक स्तर पर परिवर्तन किए थे। उसी का नतीजा था कि हम आपदा प्रभावितों का पुनर्वास और विस्थापन करने में सफल हो पाए और आपदा को काबू कर पाए। इस वक्त उत्तराखंड राज्य में आपदा आई है, उसके लिए जो धनराशि आवंटित की गई है वह नाकाफी है और राज्य सरकार से हमारी यह अपेक्षा रहेगी कि वह मजबूत पैरवी करके जो क्षति राज्य को आपदा से हुई है उसकी प्रतिपूर्ति केंद्र सरकार करेगी।
राज्यवासियों व आपदा पीड़ितों को किया निराशः हरीश रावत
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हुए कहा कि सब की प्रधानमंत्री से बड़ी अपेक्षा थी कि कम से कम राज्य सरकार द्वारा जो आंकलन क्षति का दिया गया है, उसके सापेक्ष पर्याप्त धनराशि राज्य को उपलब्ध कराएंगे। लेकिन जो धनराशि घोषित की गई है उसने राज्यवासियों को भी और आपदा पीड़ितों को भी निराश किया है,उनकी जो आकांक्षाएं और अपेक्षाएं पुनर्वास और पुनर्निर्माण की थी उसको झटका लगा है। रावत ने कहा कि हम ये सोच रहे थे कि देश के प्रधानमंत्री इन हिमालय क्षेत्रों में आ रही आपदाओं को कैसे कम किया जाए और कैसे सामना किया जाए इस पर कोई राष्ट्रीय नीति की घोषणा करेंगे या कम से कम नीति बनाने का संकेत देंगे।बादल फटना,ग्लेशियर पिघलना इन सब पर बहुत कुछ कहा जा चुका है।मूल समस्या ये नहीं कि हमने अत्यधिक पेड़ काट दिए या सड़के बना दि, यदि ऐसा होता तो राज्य के जो भूभाग 70 फीसदी वनाच्छादित हैं, वहां बादल नहीं फटते।मध्य उच्च हिमालयी क्षेत्रों में यह घटनाएं सर्वाधिक हो रही हैं और इसका दुष्प्रभाव सभी क्षेत्रों पर पड़ रहा है, जिसमें हमारे मैदानी भाबर के क्षेत्र भी शामिल हैं और यह लंबे समय से हो रहा है।





