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हिमालय की उत्तुंग शिखरों पर गूँजी ‘जो बोले सो निहाल’, श्री हेमकुंड साहिब की यात्रा का श्रद्धापूर्ण आगाज 

चमोली: हिमालय की निर्जन और विहंगम ऊँचाइयों, जहाँ प्रकृति अपनी श्वेत चादर ओढ़कर मौन तपस्या में लीन रहती है, शनिवार को वह स्थान आस्था के ज्वार से आंदोलित हो उठा। समुद्र तल से 15,000 फीट की दुर्गम ऊंचाई पर स्थित सिखों के पवित्र तीर्थ ‘श्री हेमकुंड साहिब’ के कपाट एक बार फिर से जन-आस्था के लिए खोल दिए गए। पहले ही दिन लगभग 6,500 श्रद्धालुओं ने बर्फीली पगडंडियों को पार कर गुरु के चरणों में मत्था टेका।
आध्यात्मिक ओज और सैन्य अनुशासन का संगम
यात्रा का शुभारंभ अत्यंत भव्य और गरिमामयी रहा। प्रातः 9 बजे बेस कैंप से ‘पंज प्यारों’ की अगुवाई में पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब की शोभायात्रा प्रारंभ हुई। मुख्य ग्रंथी ने जब पवित्र स्वरूप को अपने शीश पर धारण किया, तो वातावरण में गूँजते कीर्तनों और शबद के मधुर स्वरों ने हिमालय की नीरवता को भक्तिमय संगीत में परिवर्तित कर दिया।
इस अवसर पर भारतीय सेना के बैंड ने जहाँ एक ओर अपनी मार्शल धुनों से वीरता का संचार किया, वहीं दूसरी ओर भक्तिपूर्ण धुनों से वातावरण को आध्यात्मिक ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया। उल्लेखनीय है कि यात्रा मार्ग से दुर्गम बर्फ को हटाकर उसे सुगम बनाने का जो भगीरथ कार्य भारतीय सेना के जवानों ने किया, वह श्रद्धा और सेवा के अनूठे मेल को दर्शाता है। दरबार हॉल में पहुँचने के उपरांत ‘सुखमनी साहिब’ के पाठ और रागी भाई शुभदीप सिंह द्वारा प्रस्तुत आत्मिक कीर्तन ने संगत को भावविभोर कर दिया।अतुलनीय सेवा के लिए कृतज्ञता : श्री हेमकुंड साहिब ट्रस्ट के चेयरमैन नरिंदर जीत सिंह बिंद्रा ने संगत को संबोधित करते हुए भावुक स्वर में भारतीय सेना के योगदान को नमन किया। उन्होंने कहा, “दुर्गम हिमखंडों को काटकर रास्ता बनाना और यात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना, यह साधारण कार्य नहीं, बल्कि निष्काम सेवा है। सेना का यह समर्पण ही इस कठिन यात्रा की आधारशिला है।”
चेयरमैन बिंद्रा ने श्रद्धालुओं से एक संवेदनशील अपील भी की। उन्होंने कहा कि भक्तजन गुरुद्वारा परिसर की गरिमा बनाए रखें और फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी से परहेज करें, ताकि वे उस एकाग्रता और भक्ति का रसास्वादन कर सकें, जिसके लिए उन्होंने यह श्रमसाध्य यात्रा तय की है। साथ ही, उन्होंने यात्रियों को ‘गुरुद्वारा रतुरा’ का उपयोग करने का सुझाव दिया, ताकि अन्य पड़ावों पर व्यवस्था का भार कम हो सके।
सेवा और सम्मान का पर्व : इस अवसर पर गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा विशेष सम्मान समारोह आयोजित किया गया। यात्रा प्रबंधन की धुरी रहे सरदार सेवा सिंह की उपस्थिति में भारतीय सेना के ब्रिगेडियर बत्रा (कमांडेंट) और कर्नल वीरेंद्र ओला को उनकी उत्कृष्ट सेवा के लिए ‘सीरोपा’ भेंट कर सम्मानित किया गया। इसी क्रम में, भीड़ प्रबंधन और कुशल प्रशासनिक व्यवस्था के लिए पुलिस इंस्पेक्टर चित्रगुप्त और सब-इंस्पेक्टर अमनदीप को भी सम्मानित किया गया।
देश के कोने-कोने और विदेश से आए श्रद्धालुओं के साथ शुरू हुई यह यात्रा, केवल एक तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि गुरु गोबिंद सिंह  के पावन धाम के प्रति अटूट विश्वास और हिमालय की विषम परिस्थितियों में भी अटूट श्रद्धा का एक जीवंत महाकाव्य है।

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